Friday, 16 December 2016

मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर मुआवजा बांटने पर रोक

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। हाशिमपुरा नरसंहार में बृहस्पतिवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने पीडि़तों को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुआवजा देने पर रोक लगा दी है। मेरठ विधिक सेवा आयोग ने मुआवजा देने के लिए यह निर्णय लिया था।

न्यायमूर्ति गीता मित्तल व अनु मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने आयोग से मामले में जवाब दायर करने को कहा है। अदालत ने कहा कि आयोग विस्तृत जवाब दायर कर यह स्पष्ट करे कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत अब तक उसने कितने लोगों को मुआवजा दिया और अभी कितने लोग मुआवजे से वंचित रह गए हैं।

खंडपीठ ने राष्टीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की आपत्ति पर यह रोक लगाई है। एनएचआरसी की तरफ से पेश अधिवक्ता रेबेका जॉन ने अदालत को बताया कि आयोग पीडि़तों को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुआवजा प्रदान कर रहा है। उन्होंने कहा कि तय नियमों में दंड प्रक्रिया संहिता के सेक्शन 357 (ए) के तहत सेक्युलर लॉ के अनुसार मुआवजा किसी धार्मिक आधार पर तय नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि मुस्लिम लॉ में किसी व्यक्ति की मौत होने पर उसकी पत्नी के अलावा माता-पिता व अन्य को भी मुआवजे की राशि में हक मिलता है जबकि लॉ के अनुसार मृतक व्यक्ति की पत्नी ही मुआवजे की हकदार है।

उप्र सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि मुआवजा तय करने में सरकार की कोई भूमिका नहीं है। मेरठ विधिक सेवा आयोग का सदस्य न्यायिक अधिकारी होता है। मामले की अगली सुनवाई 12 जनवरी 2017 को होगी। घटना के दिन कौन से पुलिसकर्मी ड्यूटी पर थे इस बारे में जानकारी ना होने पर अदालत ने नाराजगी जताई।

पीठ इस मामले में आरोपी बनाए गए पीएसी के 16 जवानों को तीस हजारी कोर्ट द्वारा 21 मार्च 2015 को बरी करने के खिलाफ दायर अपील पर भी सुनवाई कर रही है। निचली अदालत के फैसले को एनएचआरसी, उप्र सरकार के साथ ही पीडि़तों के बच्चों ने भी चुनौती दी है।

Source:jagran.com

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