विश्व गोरैया दिवस विशेष : दिल्ली में कबूतरों ने बेदखल किया गोरैया को
नई दिल्ली कबूतरों को उड़ाना, इनको दाना देना या इनकी लड़ाई देखना भले ही मुगलिया शौक रहा हो, लेकिन राजधानी की राज्य पक्षी गोरैया को यहां से बेदखल करने में कबूतरों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
पशु पक्षियों की संख्या वहां अधिक बढती है, जहां उनको पर्याप्त खाना मिले और रहने के लिए उचित वातावरण हो। गोरैया को न तो खाना मिलता है और न ही यहां पर रहने के लिए उसके अनुकूल स्थान है। दिल्ली के विभिन्न चौराहों पर कबूतरों को दाना देना धार्मिक मान्यता से जैसे जैसे जुड़ता गया गोरैया जैसी छोटी पक्षी के लिए दायरा कम होता गया।
आज आलम यह है कि गोरैया का फुदकना, चहचहाना और इस मुंडेर से उस मुंडेर पर बैठना लगभग खत्म ही हो गया है। वन्य जीव विशेषज्ञ डा. फैय्याज ए खुदसर का कहना है कि दिल्ली से गोरैया को बेदखल करने में कबूतरों की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। लोगों को लगता है कि यदि वह कबूतरों को दाना देगें तो यह पुण्य का कार्य होगा। लेकिन इसके कारण राजधानी में बेतहासा कबूतरों की संख्या में वृद्धि हो रही है। इसके अपने नुकसान भी हैं।
गोरैया की संख्या में कमी के कई कारण और भी हैं जैसे यह छोटी पक्षी और इसके खाने का तरीका अन्य पक्षियों के अलग है। यह घास का बीज खाती है और इसके छोटे बच्चे अधिक प्रोटीन के लिए इल्लियां खाते हैं। जो प्राय: किचन गार्डेन में मिलना है लेकिन जब राजधानी में लोगों को अपने रहने के लिए जगह कम है लोग पक्षियों के घोसलों को कैसे बर्दाश्त करेंगे।
घरों की डिजाइन भी ऐसी है कि यहां पर ताखे नहीं निकाले जाते। यही नहीं अब छोटे पेड भी राजधानी में नहीं हैं जिससे गोरैया उसमें घोसला बनाए। यही नहीं वन क्षेत्र कम हो गए हैं, जहां से इनको चारा मिलता था। अब वह नहीं मिलता। यह बाजरा खाती हैं और कबूतरों को लोग बाजरा ही खिलाते हैं, लेकिन उनकी संख्या इतनी अधिक हैं कि गोरैया वहां बाजरा या चावल खाने के लिए फटक भी नहीं सकती।
डा. खुदसर का कहना है कि गोरैया की संख्या में कमी का एक और प्रमुख कारण लोगों की इस पक्षी के प्रति संवेदनहीनता भी है। क्योंकि लोग अब पक्षियों के बारे में नहीं सोचते हैं। अपने स्तर प्रयास करके गोरैया की संख्या बढाई जा सकती है।
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