नई दिल्ली| उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के बीच स्थित चार धाम देश-दुनिया में अपनी कौमी एकता की मिसाल पेश करते हैं। इन धामों में प्रसिद्द बदरीनाथ धाम के कपाट खुल गए हैं। यहां भक्तों का आना जाना शुरू हो चुका है। इस धाम में दर्शन के लिए पहुंचने वाले हर भक्त के कानों तक पहुंचने वाली आरती भी अपने आप में ख़ास इतिहास समेटे हुए है। इस इतिहास के बारे में बताते हैं इतिहासकार डॉ. एम. एस. गुसाईं।
डॉ. एम. एस. गुसाईं का कहना है कि देवभूमि के चमोली जिले में स्थापित बदरीनाथ धाम एक ऐसा मंदिर है, जहां की परंपरागत पूजा और कपाट खुलने के बाद की पूजा में आज भी सालों पहले एक मुस्लिम शख्स की लिखी आरती की पावन धुन के साथ तीनों पहर आरती की जाती है।
बीते 151 सालों से कपाट खुलने से बंद होने तक मंदिर में रोज़ाना सुबह-शाम जो आरती की जाती है, उसे चमोली के एक युवा मुस्लिम शायर ने लिखी थी। उस शायर का नाम फकरुद्दीन उर्फ़ बदरुद्दीन था, जो चमोली जिले के नंदप्रयाग का निवासी था।
बदरुद्दीन ने बद्री विशाल की अलौकिक आरती को सन् 1865 में लिखी थी। तभी से भगवान बद्री विशाल की पूजा अर्चना विधिवत परंपराओं की शुरुआत इसी आरती के साथ होती है।
डॉ। एम। एस। गुसाईं ने बताया कि जब ये आरती फकररुद्दीन ने लिखी थी, तब उनकी उम्र महज 18 वर्ष थी। फकरुद्दीन तब नंदप्रयाग में पोस्टमास्टर हुआ करते थे। इस आरती में बद्रीनाथ धाम के धार्मिक महत्व के अलावा यहां की सुंदरता का भी वर्णन किया गया है।
इस आरती को लिखने के बाद उन्होंने अपना नाम बद्रीनाथ के नाम पर बदरुद्दीन भी रख लिया था। 104 वर्ष की उम्र में साल 1951 में बदरुद्दीन का निधन हो गया था। उनकी लिखी गई बद्रीनाथ जी की आरती मौजूदा वक्त में भी मंदिरों में गाई जा रही है।
Source:livetoday.online
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