वॉशिंगटन
भारत में काम कर रहे ग्रीनपीस जैसे पर्यावरण समूहों और दूसरे कई अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों ने खुद को मिल रहे अनुदान पर मोदी सरकार की निगरानी बढ़ने के बाद अमेरिकी सरकार से दखल की मांग थी। विकीलीक्स की ओर से जारी ई-मेल के माध्यम से यह खुलासा हुआ है।
ये ई-मेल ‘क्लिंटन कैम्पेन’ के प्रमुख जॉन पोदेस्ता के ई-मेल अकाउंट को हैक करके हासिल किए गए हैं। ई-मेल से इन संगठनों को वैश्विक स्तर मिल रहे धन का पता चलता है। इनमें वे पर्यावरण समूह भी शामिल हैं, जो ऑस्ट्रेलिया में अडानी समूह की खनन परियोजना का विरोध कर रहे हैं। ‘सैंडलर फाउंडेशन’ के अनुदान निदेशक सर्गई नाएबेल ने 27 मई, 2015 को लिखे पत्र में कहा, ‘अडानी प्रधानमंत्री मोदी के बहुत नजदीक हैं, इसलिए यह गंभीर कूटनीतिक चुनौती है।’
यह पत्र नाएबेल ने व्हाइट हाउस से विदा होने के कुछ महीनों बाद भेजा था। सैन फ्रैंसिस्को के निकट स्थित ‘सैंडलर फाउंडेशन’ ने 2015 तक वैश्विक स्तर पर काम कर रहे कई गैर सरकारी संगठनों को 75 करोड डॉलर का अनुदान दिया था।
‘सैंडलर फाउंडेशन’ ने ‘सनराइज प्रोजेक्ट’ को भी धन दिया, जो ऑस्ट्रेलिया में अडानी समूह के 21.7 अरब डॉलर की खनन परियोजना का विरोध कर रहा है। नाएबेल ने पोदेस्ता को लिखे एक पत्र में कहा, ‘ऑस्ट्रेलिया में भी गैर सरकारी संगठनों के लिए स्थिति गंभीर हो रही है। एबॉट सरकार उन संगठनों पर नजर रख रही जो कोयला खनन के विस्तार के खिलाफ और पहाडी क्षेत्र के लिए लड रहे हैं।’ उन्होंने कहा कि यही हाल भारत और कनाडा में काम कर रहे संगठनों को लेकर भी है।
Courtesy:indiatimes.com
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