नई दिल्ली, [हरिकिशन शर्मा]। केंद्र और राज्य सरकारें अगर कैग की चेतावनी पर अमल करतीं तो सरकारी खजाने में भारी भरकम धनराशि आ जाती। असल में कैग ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट्स के माध्यम से बीते पांच साल में केंद्र और राज्य सरकारों को भारी भरकम 6.67 लाख करोड़ रुपये की रिकवरी बतायी लेकिन सरकारी बाबू इसमें से बमुश्किल तीन प्रतिशत राशि ही खजाने में ला सके। अगर यह पूरी धनराशि सरकारी खजाने में आ जाती तो केंद्र और राज्यों को हर साल विकास कार्यक्रम चलाने के लिए अच्छी खासी राशि उधार लेने की जरूरत नहीं पड़ती।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की 'परफॉरमेंस एक्टिीविटी रिपोर्ट 2015-16' के अनुसार पिछले पांच वर्षो में कैग ने केंद्र और राज्य सरकारों के अलग-अलग विभागों का सालाना ऑडिट करने के बाद 6,67,601 करोड़ रुपये की राजस्व हानि उजागर की। सरकार ने इसमें से 2,26,987 करोड़ रुपये रिकवरी की जरूरत स्वीकार की।
कैग के एक अधिकारी ने कहा कि केंद्र व राज्य सरकारें अगर कैग की चेतावनी पर ध्यान देकर कार्रवाई करतीं तो हर साल अरबों रुपये सरकारी खजाने में आते। कैग के बताने पर भी केंद्र और राज्य सरकारें रिकवरी नहीं कर पायीं। इससे केंद्र और राज्य सरकारों के उदासीन रवैये की पोल खुलती है।
रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2015-16 में भी कैग ने 88,089 करोड़ रुपये की राजस्व क्षति की ओर ध्यान दिलाया जिसमें से सरकारी विभागों ने सिर्फ 39,447 करोड़ रुपये की रिकवरी की जरूरत स्वीकार की। हालांकि इसमें से सिर्फ 4,523 करोड़ रुपये ही वसूल किए जा सके।
असल में कैग किसी सरकारी विभाग का ऑडिट करते समय यह देखता है कि क्या कोई टैक्स कम वसूला गया है या फिर किसी कार्य पर अवांछित ढंग से खर्च किया गया है। ऐसा होने पर सरकारी खजाने को कितना नुकसान हुआ है। जब इस तरह का कोई मामला सामने आता है तो कैग संबंधित सरकारी विभाग को उक्त राशि को वसूलकर सरकारी खजाने में लाने को कहता है। हालांकि सरकारी बाबूओं की उदासीनता की वजह से अक्सर यह राशि खजाने में नहीं आ पाती।
Source:jagran.com
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