सपा के घमासान को देखते हुए भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपने उम्मीदवार चयन के काम को कुछ धीमा किया है। पार्टी नेता सपा के अतंरकलह और बसपा के मिुस्लम एजेंडा पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। पार्टी ने हर क्षेत्र से नए हालात की जानकारी मंगाई है। 15 नंवबर तक इसके आने की संभावना है, जिसके बाद जातीय व सामाजिक समीकरणों को देखते हुए रणनीति बनाई जाएगी।
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सपा के शीर्ष स्तर पर मचे घमासाम से उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति भले ही गरमा गई हो, लेकिन दलों की रणनीति गड़बड़ा गई है। सपा को नए गठबंधन की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ रही है, तो भाजपा को भी सपा के बजाय बसपा को रोकने के लिए चुनाव प्रबंधन, उम्मीदवार चयन और प्रचार सामग्री की तैयारी में बदलाव करना पड़ रहा है। ऐसी स्थति में पार्टी अपने तंत्र के अलावा निजी तौर पर भी सर्वेक्षण करा रही है। पार्टी के एक प्रमुख नेता ने कहा है कि अभी तक मुख्य लड़ाई तो सत्तारूढ़ सपा से ही होगी, लेकिन अब हम बसपा को नजरंदाज नहीं कर सकते हैं।
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समीकरण साधने बंद कमरों में रही है चर्चाएं
भाजपा का पूरा जोर अब पिछड़ा वर्ग पर है। सूत्रों के अनुसार भाजपा के टिकट बंटवारे में सबसे ज्यादा जगह भी इसी वर्ग को मिलनी है। लोध, कुशवाहा, कुर्मी आदि प्रमुख पिछड़ा वर्ग की जातियों पर उसका खासा जोर है। इन वर्गों से जुड़े उसके नेताओं के दौरे भी शुरू हो चुके हैं। कस्बों और गांवों में सभाओं के बजाय बंद कमरों की बैठक में इस बारे में चर्चाओं का दौर जारी है। इस बीच, पार्टी ने संकेत दिए हैं कि दूसरे दलों से आ रहे नेताओं को भी नए सामाजिक समीकरणों के लिहाज से ही हरी झंडी दी जाएगी। भाजपा सत्ता से जुड़े रहे ऐसे किसी नेता को नहीं लेना चाहती हैं, जिसके खिलाफ माहौल (एंटी इनकमवेंसी) उसे भारी पड़े।
Courtesy:livehindusthan.com
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